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RAW – Romeo Akbar Walter review: An undercooked thriller in Hindi

Posted 2019/04/06 2084 0

फिल्म के बारे में कुछ भी बताने से पहले फिल्म के नाम के बारे में बताता चलूं कि रोमियो, अकबर, वाल्टर – रॉ यानी रिसर्च एंड अनिलासिस विंग – के नाम पर रखा गया है।

डायरेक्टर और राइटर – रोबी शाह
डायलॉग – इशराक एबा
प्रोडक्शन – विअकोम 18 पिक्चर्स
म्यूजिक – अंकित तिवारी, हनीफ शैख़ (बैकग्राउंड)
सिनेमेटोग्राफर – तपन बासु
एडिटर – निलेश गिरधर

#कहानी कुछ यूँ है कि 1968 में रॉ का गठन होने के बाद रॉ चीफ श्रीकांत (जैकी श्रोफ़) को 1971 में एक ऐसे स्पाई की ज़रुरत पड़ी जो बॉर्डर पार से इनफार्मेशन ला सके। अब वो और कोई नहीं अपना रोमियो अली (जॉन अब्राहिम) ही हो सकता था। बैंक में नौकरी करता रोमियो एक्टिंग भी करता था इसलिए रॉ में उसकी डायरेक्ट भर्ती हो गयी। अब वो आज़ाद (POK) कश्मीर गया और फिर अपने दिमाग के बूते पर कराची। यहाँ से उसका मिशन शुरू हुआ जहाँ उसका काम 1971 में 22 नवम्बर को ईस्ट पाकिस्तान होने वाली एयरस्ट्राइक को रोकना।
#स्क्रिप्ट बला की स्लो है, बहुत स्लो लेकिन बीच-बीच में कुछ एक टर्न डाले गये हैं जो जम्हाई लेते मुँह को बंद कर सकें। इंटरवल से ठीक पहले भी एक ऐसा ही टर्न है।
स्क्रिप्ट में लूप होल्स बहुत हैं। शुरू से आखिर तक हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट आलिया भट्ट, विकी कौशल और मेघना गुलज़ार की फिल्म राज़ी देखने के बाद लिखी गयी लगती है। काफी चीज़े मिलाने की कोशिश में बहुत सी चीज़े छूट गयी हैं। (डिटेल बताना स्पोइलर होगा)

#डायरेक्शन फिर भी ठीक है। लेकिन ये शै स्क्रिप्ट पर डिपेंड करती है तो इसलिए डायरेक्शन के बारे में कुछ अलग लिखना अजीब लगेगा।

#एक्टिंग तो जॉन करते ही अच्छी हैं पर इस फिल्म में कई जगह पर पत्थर लगे हैं। एक्सप्रेशन लेस लगे हैं, बेमन से काम निपटाते लगे हैं। हालाँकि स्टिल, एक्टिंग अच्छी है। जॉन के साथ मौनी भी हैं जिनका न होने जैसा किरदार है। स्क्रिप्ट की लचक देखिए कि मौनी रॉ एजेंट होने के साथ-साथ इंडियन हाई कमीशन की सक्रेटरी भी हैं फिर भी अपने ही ऑफिस के बाहर से पैनिक कॉल कर रही हैं। जैकी श्रॉफ की एक्टिंग अच्छी है लेकिन जयदीप अहलावत जैसी एनर्जी नहीं। जयदीप ने किरदार को जीवंत कर दिया था। रघुवीर यादव का रोल और एक्टिंग दोनों बहुत ज़बरदस्त है। अनिल जोर्ज की मैं शायद तीसरी फिल्म देख रहा हूँ जब वो पाकिस्तानी बने हैं। उनकी एक्टिंग भी अच्छी है। अल्का आमिन का रोल ज़्यादा था नहीं पर वो नेचुरल लगी हैं। सिकंदर खेर (किरन खेर के बेटे) की एक्टिंग लाजवाब है। बिलकुल नेचुरल। मुश्ताक कक (जोकर) और राजेश श्रृंगरपुरे औसत हैं।

#सिनेमेटोग्राफी

तकरीबन लीड एक्टर्स के क्लोज़अप सीन लेने पर ही सारा ज़ोर रखा है। कश्मीर में होते हुए भी लोंग शॉट में वादियाँ दिखाने से परहेज़ रखी गयी है। बम वगरह के सीन अनिमेशन से खप गये हैं। गजेट्स की डिटेलिंग दिखाने से परहेज़ की है।

#एडिटिंग से कुछ नहीं तो 12 मिनट की फिल्म कम हो सकती थी। शुरूआती गाना, टॉर्चर का लम्बा सीन फिर स्लो मोशन की अति, ये कट शॉट किए जा सकते थे।

कुछ एक बातें जो खटकी –

फटाफट स्पाई बन जाना, कोई ख़ास ट्रेनिंग और फैलियर नहीं।
जनरल तक को बम से उड़ा देना वो भी एक आदमी के लिए।
अमूमन जब कोई किसी को अजनबी शहर में ‘खुश’ होकर काम के लिए बुलाता है तो वो ही उसे रहने की जगह भी देता है, उसको तो ज़रूर जिसने उसकी जान बचाई हो। यहाँ कराची में अपने घर का पहले से इंतेज़ाम अजीब लगा।
आईएसआई ऑफिसर की वर्दी कहाँ से मिली?
पानी में कितनी देर सांस रोक सकता है कोई? अच्छा पानी में कूदने की आवाज़ भी नहीं आती?

ऐसे छोटे-मोटे मीन-मेख और हैं पर इतने काफी हैं अभी। कुछ भली बातें भी –

मेसेज ट्रान्सफर करने का तरीका लाजवाब
इंटरवल से पहले का ट्विस्ट बढ़िया
क्लाइमेक्स से पहले का ट्विस्ट अच्छा
आफ्टर क्लाइमेक्स का ट्विस्ट प्रेडिक्टेबल पर ठीक

कुलमिलाकर फिल्म एक बार देखी जा सकती है लेकिन थ्रिलर सोचकर नहीं, ड्रामा मानकर। फिल्म में थ्रिल की बेहद कमी हैं पर ख़ुशी है कि अब जाकर ही सही, हमारे वॉर हीरोज़ पर मेन स्ट्रीम सिनेमा (जेपी दत्ता के अलावा भी) फिल्मे बनाने लगा है।

देखने की वजह – अच्छी एक्टिंग, प्लाट अच्छा और अच्छा सा क्लाइमेक्स

न देखने का बहाना – स्लो-स्लो स्नेल सी स्क्रिप्ट, मिसटाइम्ड गाने और थोड़े हल्के किरदार

रेटिंग – 6/10*

#सहर

(Review अच्छा लगा हो तो लव रिएक्शन दें)

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